केले की खेती

केले की खेती


G9 टिषु कल्चरGrand Naine

  • G9 टिशु कल्चर के पौध रोण से केले में बीमारी कम लगती है। कम समय में फसल तैयार होती है। अतः उत्पादन अधिक होता है। लाइन से लाइन की दूरी 1.82 मी0 और केले से केले की दूरी 1.52 मी0 रखने से 1 एकड़ में 1452 पौध आते हैं। लाईन की दिषा उत्तर से दक्षिण होना चाहिए।
  • केले को पानी की अत्यधिक आवष्यकता होती है, लेकिन केला का जड़ पानी खींचने में काफी कमजोर होने के कारण प्रभावी सिंचाई हेतु ड्रिप इरिगेषन अनिवार्य है। (लगभग 225-250 फल/पौध उत्पादन होता है। एक पौध में 16 घार-प्रत्येक में 16 फल आते हैं। एक पौध से लगभग 30 किलो फल प्राप्त होता है। फल लम्बा बेलनाकार और कम घुमावदार होता है। फल को लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। फल पकने पर पीला-हरा रंग प्राप्त कर लेता है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में ताजे व प्रसंस्कृत फल के रूप में इसकी मॉग बनी रहती है। पौध की लम्बाई 6.5 से 7.5 फीट होती है। लगाने के 11-12 माह बाद तुड़ाई प्रारम्भ हो जाती है। एक एकड़ में 1200 पौध लगाने की अनुषंसा की गयी है।
  • दूरी 6 ग 5 फीट आर्दष होता है, कुछ लोग 6 ग 6 फीट या 7 ग 5 फीट पर भी लोग पौध लगाते हैं। इस प्रजाति में केले को नमी और गर्मी दोनों पसन्द हैं। कोहरा/ओला ;तिवेजद्ध और एरिड कन्डीषन इसे नुकसान पहुॅचाता है। तापमान 150 सेंटीग्रेट से 350 सेंटीग्रेट नमी 75-85 प्रतिषत होनी चाहिए। मिट्टी अत्यधिक उपजाऊ, नमी सोखने वाला होना चाहिए। तापमान 120 सेंटीग्रेट से कम होने पर पौधे नष्ट होने लगते हैं। हवा की गति 80 कि0मी0/घंटे पौध को नुकसान पहुॅचा सकती है। वर्षा के मौसम में वर्षा का औसत 650-750 उउ होने से पौध षक्तिषाली होकर बढ़ता है। पानी निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए rich loamy soil, PH – 6-7.5, कार्बनिक पदार्थ से भरपूर, उच्च नाइट्रोजन का स्तर, फास्फोरस व पोटाष कीे ज्यादा मात्रा केला के अच्छे उत्पादन के लिए आवष्यक है।


खेत की तैयारी:

  •  पहले खेत में सनई, ढ़ैचा या cowpea को बोकर पेड़ बड़ा होने पर पलट दें। भूमि का पुनः 2 से 4 बार जुताई कर रोटावेटर से समतल कर लें। अंतिम जुलाई के समय ही केचुऊ की खाद मिला दें।
  • 45 ग 45 ग 45 से0मी0 के गड्ढे़ में 10 किलो केचुए की खाद 250 ग्राम नीम केक, 20 ग्राम conbofuron व उपरी सतह की 8‘‘ तक की मिट्टी गड्ढे़ में मिलाने से पहले गड्ढ़ा 15-20 दिन के लिए सूर्य की रोषनी हेतु छोड़ दें ताकि नुकसानदायक कीड़े मकोड़े मर जायें। इस तरीके से जमीन से उत्पन्न होने वाली बीमारियां कम हो जाती हैं फिर गडढे में मिक्सचर भर दें। जमीन से 02 से0मी0 नीचे गड्ढे़ के बीच में पौध लगाकर दबा दें। फिर सिंचाई कर दें। 95 प्रतिषत से 98 प्रतिषत पेड़ में फल आते हैं। पौधा जाड़ा और गर्मी की अवधि केा छोड़कर कभी भी लगाया जा सकता है।

पुलिंग ;(Male) फूल ;(Buds) की निकासी
डंसम ठनके को अंतिम 01-02 छोटे हाथ से काटकर निकाल देते हैं। इस प्रकार अंतिम हाथ में 01 अंगुली(केला) बची रहेगी इससे फलों का विकास होता है और गुच्छे ;(Bunch) का वजन बढ़ता है।

गुच्छा या घार ;(Bunch) पर छिड़काव –
कीड़ा Thrips से केले के फल का रंग बदलने लगता है अतएव गुच्छा पर मोनोक्रोटोफास ;(Monocrotophos) के 0.2 प्रतिषत घोल का छिड़काव करें।

केले के घार (गुच्छा) को ढ़कना –
केले के घार को केले के सूखे पत्ते से ढकने से फल को सूर्य के धूप से बचाव होता है और फलों की गुणवत्ता बढ़ जाती है, लेकिन वर्षा के मौसम में यह कार्य न करें। घार को नीले प्लास्टिक से ढ़कने (Sleeving) से धूल , कीड़े-मकौड़े, अवषेष कीटनाषक एवं चिड़ियों से बचाव होता है। घार के तापमान बढने से फल भी जल्दी पकता है।

खाद व उर्वरक-
20 किलो केंचुए की खाद, 200 ग्राम नाइट्रोजन, 60-70 ग्राम फास्फोरस ;(P) 300 ग्राम पोटाष ;(K)( प्रति पौध की आवष्कता होती है। 10 क्विंटल केला उत्पादन हेतु 7-8 कि0ग्रा0 N 0.7 -1.5 किलो फास्फोरस, 17-20 किलो पोटाष ;ज्ञद्ध की आवष्यकता होती है। परम्परागत विधि से खाद देने में खाद का काफी अंष बेकार हो जाता है। ड्रिप सिंचाई के Fertigation विधि से पानी में घुलनषील उर्वरक या तरल उर्वरक देने से उत्पादन में 25-30 प्रतिषत तक की वृद्धि देखी गयी है।

 

केलों के बीच खेती
45-60 दिनों वाली फसल यथा मूॅग cowpea, ढैचा का उपयोग हरी खाद के लिए किया जा सकता है। पेड़ों पर चढ़ने वाले परिवार की कोई सब्जी नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि ये वायरस के संवाहक होते हैं।
खरपतवार:- पौधा लगाने से पहले प्रति हेक्टेयर 2 लीटर ग्लाइफोसेट (Glyphosate) का छिड़काव करने से खेत में खर-पतवार नहीं आते हैं। एक या दो बार हाथ से निराई-गोड़ाई आवष्यक है।

 

Micronutrient Foliar Spray

znSO4 (0.5%), Fe SO4 (0.2%), CuSO4 (0.2%) H3BO3 (0.1%) के संयुक्त छिड़काव से फलों में चमक आती है, फल स्वस्थ रहता है एवं उत्पादकता में वृद्धि के गुण केला में आ जाते हैं। 100 लीटर पानी में 500 ग्राम जिंक सल्फेट मिलाकर मिश्रण घोल बना लें फिर इस मिश्रण के 10 लीटर घोल में 5-10 मि0ली0 चिपकने (Sticker) वाला घोल यथा Teepol का छिड़काव करें जब तक 100 लीटर पानी के घोल का मिश्रण समाप्त नहीं हो जाता है। इसी तरह से 100 लीटर पानी के घोल में 200 ग्राम फेरम सल्फेट मिलाकर इस घोल के 10 लीटर में 5-10 ग्राम टीपाल घोल डालकर छिड़काव करें। यह प्रक्रिया तब तक करें जब तक 100 लीटर घोल का मिश्रण समाप्त नहीं हो जाता है। इसी तरह से कापर सल्फेट 200 ग्राम 100 ली0 पानी में डालकर इसके 10 लीटर घोल में टीपाल डालकर छिड़काव करें, जब तक 100 लीटर पानी के घोल का मिश्रण समाप्त नहीं हो जाता है।

  • घार(गुच्छा) में कुछ अपूर्ण हाथ होते हैं, जो गुणवत्तापूर्ण उत्पादन हेतु ठीक नहीं है। इन हाथों को फूलने (bloom) के तुरन्त बाद निकाल देना चाहिए, इससे बचे अन्य हाथों में फल का वजन बढ़ता है। कभी कभी अपूर्ण हाथ के ठीक ऊपर का हाथ भी निकाल देते हैं।
  • गुच्छे का वजन ज्यादा होने के कारण पेड़ गिरने न पाये इसके लिए बॉस पेड़ की झुकने वाली दिषा में लगाकर त्रिभुज बना देते हैं इससे गुच्छे का समरूप विकास होता है।
  • जब केले में पकने की रंगत आने लगे तो उसे तोड़ लिया जाता है। केला पकाने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद फल उपयोग में लाया जाता है।
  • परिपक्वता का पैमाना – यह अनुभव से ज्ञात होता है, जिसमें फलों के आकार, फल की वक्रता, दूसरे हाथ के घेराव की आकृति, फल में  स्टार्च की मात्रा, फूल आने के बाद से परिपक्वता तक की अवधि इत्यादि का उपयोग किया जाता है। बाजार में मॉग के अनुसार भी कच्चे व परिपक्व फलों को भेज दिया जाता है।

गुच्छे की कटाई – केले के लटकते सम्पूर्ण समूह को गुच्छा या घार कहा जाता है। फल लटकते गुच्छों में बड़े होते हैं जिसमें 20 फलों तक की एक पंक्ति होती है (जिसे हाथ भी कहते हैं) और एक गुच्छे में 3 से 20 केलों की पंक्ति होती है फिर प्रत्येक फल केला या अंगुली के रूप में ज्ञात होता है। एक फल औसतन 125 ग्राम का होता है जिसमें लगभग 75 प्रतिषत पानी और 25 प्रतिषत सूखा सामग्री होता है। पहले हाथ की कटाई के पष्चात् उपज में 100-110 दिन की देरी हो सकती है। अतः पहले हाथ की कटाई न करें। घार को सूर्य की किरणों से दूर रखते हैं ताकि जल्दी न पके और फल मुलायम न हो जाये। फिर घार को सुरक्षित तरीके से बाजार में पहुॅचाया जाता है। लगाये गये पौधे की उपज 11-12 माह के बाद तैयार हो जाती है। पहली हारवेस्टिंग (कटाई) के 08-10 माह दूसरी तंजववद फसल तैयार हो जाती है और दूसरी फसल की कटाई के 8-9 माह बाद तीसरी फसल तैयार हो जाती है। इस प्रकार 28-30 माह के भीतर 03 फसल केले की हो जाती है। ड्रिप सिंचाई के साथ फर्टिगेषन विधि से फसल तैयार करने में 100 टन प्रति हेक्टेयर टिषू कल्चर से प्राप्त होता है। अच्छी व्यवस्था करने से दूसरी व तीसरी फसल में इतना ही उत्पादन हो सकता है।

मुख्य बातें –
1. यदि मौसम सहायता दे तो केले की खेती लाभदायक हो सकती है
2. संस्था कच्चे केले सुखाने की मषीन जो सौर्य किरणों से संचालित है भी क्रय करने में मदद करेगी।
3. जाड़ों में जब तापमान 5 से 7 सेन्टीग्रेड से नीचे चला जाता है तो ऐसी स्थिति में फसल को कम से कम नुकसान पहुॅचे, इसके लिए पौध की रोपाई 2.1 मीटर ग 1.5 मीटर पर करना चहिए।
4. बाजार में भेजने हेतु पहले हाथ से 1 फीट ऊपर से गुच्छे के तना की कटाई तेज चाकू से की जाती है।

 

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